आदि गौड़ ब्राह्मण समाज आदि गौड़ ब्राह्मण समुदाय का एक प्रतिष्ठित सामाजिक संगठन है। गौड़ ब्राह्मण भारत के पंच-गौड़ ब्राह्मण समुदायों में गणनीय, वेद एवं वेदांग की सुदीर्घ परंपरा वाले प्राचीन ब्राह्मण हैं, जिनमें आदि गौड़ शाखा मूल एवं प्राचीनतम मानी जाती है। हमारा समाज विद्या, संस्कार, सेवा एवं एकता के आदर्शों पर आधारित है और सन् 1966 से समाज के सर्वांगीण विकास हेतु निरंतर प्रयासरत है।
हमारी वंश-परंपरा, गोत्र, प्रवर एवं वेद-शाखाएँ ब्राह्मणोत्पत्ति-मार्तण्ड तथा गौड़ विप्र पञ्चाङ्ग गोत्रावली जैसे प्रामाणिक शास्त्रीय ग्रन्थों में सुरक्षित हैं। इसी समृद्ध विरासत को संजोते हुए हम समाज के हर परिवार तक पहुँचने और उन्हें सशक्त बनाने का कार्य कर रहे हैं। समाज का विस्तृत इतिहास पढ़ें →
॥ आराध्य भगवान परशुराम ॥
समाज के सभी बंधुओं को एकता के सूत्र में बाँधना, शिक्षा एवं संस्कारों को प्रोत्साहित करना, तथा जरूरतमंदों की निःस्वार्थ सेवा करना। हम समाज में सद्भाव, सहयोग एवं आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए समर्पित हैं।
एक ऐसे सशक्त, शिक्षित, आत्मनिर्भर एवं संस्कारवान समाज का निर्माण करना, जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखते हुए आधुनिक युग में गर्व से आगे बढ़े और राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे।
प्रत्येक गौड़ विप्र परिवार की वैदिक पहचान इन पाँच अंगों से बनती है, जो गौड़ विप्र पञ्चाङ्ग गोत्रावली में संकलित हैं।
जिस आदि ऋषि से कुल प्रवर्तक हुए, उनका वही "ऋषि गोत्र" कहलाया।
महाराज जनमेजय के यज्ञ में महर्षि वकदेव मुनि ने १४४४ शिष्य ब्राह्मणों को ग्राम दान किया; जो जिस ग्राम में बसा, उसी नाम से उसका "शासन" कहलाया।
अध्ययन किये गये वेदों/कर्मकाण्ड के अनुसार पदवी — त्रिवेदी, द्विवेदी, पुरोहित, जोषी, व्यास, दीक्षित आदि।
गोत्रकार ऋषि के पश्चात् पुत्र-पौत्र आदि के क्रम से बना प्रवर, संख्या ५ तक।
कुल के प्रवर्तक ने जिस वेद-शाखा का पठन-पाठन चलाया, वही कुल की शाखा (उदा. माध्यन्दिनी, काण्वी)।
वैदिक परंपराओं एवं संस्कारों का संरक्षण।
समाजबंधुओं में परस्पर सहयोग व भाईचारा।
प्रत्येक बालक-बालिका तक शिक्षा की पहुँच।
निःस्वार्थ भाव से जनसेवा एवं परोपकार।
समाज की गतिविधियों से जुड़ें और अपने योगदान से इस परिवार को और सशक्त बनाएं।
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